…यहां मजाक में भी कोई झूठ नहीं बोलता था!

महाभारत के आदि पर्व के 63वें अध्याय, छंद संख्या 10-12 में लिखा है, चेदि के जनपद के धर्मशील, संतोषी और साधु हैं। यहां मजाक में भी कोई झूठ नहीं बोलता था!

May 2, 2017
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चंदेरी इस समय मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले के अंतर्गत आता है। कहा जाता है कि इस शहर का प्राचीन नाम चंद्रगिरि था। चंदेरी, महाभारत काल में श्रीकृष्ण के प्रतिद्वंद्वी और उनके बुआ के भाई शिशुपाल की राजधानी थी।

शिशुपाल चेदि देश का राजा था। जनश्रुति है कि चंदेरी की स्थापना संभवतः आठवीं शती ई. में चंदेल राजपूतों ने की थी जो चंद्रवंशीय क्षत्रिय माने जाते थे। इन्होंने इसका नाम चंद्रपुरी रखा था।

यह भी संभव है कि महाभारत कालीन चेदि देश की राजधानी होने से इस नगरी को चेदिपुरी या चेदिगिरि कहा जाता था, जिसका अप्रभंश कालांतर में चंदेरी हो गया। भारतीय इतिहास में चंदेरी का बड़ा ही महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है।

कहा जाता है कि प्रथम मुगल बादशाह बाबर ने इस पर अधिकार किया था, बाद में 18वीं शती के अंतिम चरण में जब मुगल वंश का पतन हो रहा था तब इस पर सिंधिया का अधिकार हो गया।

शिशुपाल से है गहरा नाता

शिशुपाल महाभारत कालीन चेदि राज्य का राजा था। महाभारत के आदि पर्व के 63वें अध्याय, छंद संख्या 10-12 में लिखा है, चेदि के जनपद धर्मशील, संतोषी और साधु हैं। यहां मजाक में भी कोई झूठ नहीं बोलता था।

शिशुपाल, श्रीकृष्ण से इसलिए था नाराज

महाभारत में उल्लेखित है कि विदर्भराज के रुक्म, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली नामक पांच पुत्र और एक पुत्री रुक्मणी थीं। रुक्मणी अति सुन्दरी थीं। विदर्भराज, श्रीकृष्ण से रुक्मणी का विवाह करना चाहते थे। लेकिन रुक्म (रुक्मणी का बड़ा भाई) चाहता था कि उसकी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ हो जाए।

उसने विदर्भराज से बिना पूछे ही रुक्मणी का टीका शिशुपाल के यहां भिजवा दिया। रुक्मणी कृष्ण पर आसक्त थीं, इसलिए उन्होंने एक व्यक्ति द्वारा कृष्ण को संदेशा भेजा।

तब कृष्ण ने रुक्मणी का हरण कर विवाह किया। इस बात से चेदिराज शिशुपाल नाराज हो गया और श्रीकृष्ण को शत्रु समझने लगा। समय बीतता गया। एक बार युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ करवाया तब प्रमुख राजाओं को यज्ञ में आने का निमंत्रण दिया गया जिसमें चेदिराज शिशुपाल भी था। देवपूजा के समय कृष्ण का सम्मान देखकर वह जल गया और उनको अपशब्द कहने लगा।

उसके इन कटु वचनों की निंदा करते हुए श्री कृष्ण के अनेक भक्त सभा छोड़ कर चले गये क्योंकि वे श्री कृष्ण की निंदा नहीं सुन सकते थे। जब शिशुपाल श्री कृष्ण को काफी अपशब्द कह चुका था। तब श्री कृष्ण ने गरज कर अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का सिर काट दिया।

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